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इस्लाम धर्म का इतिहास और जानकारी | History Of Islam Dharm In Hindi

 

              इस्लाम धर्म का इतिहास और जानकारी                        History Of Islam Dharm in Hindi            Islam Dharm / इस्लाम एक एकेश्वरवादी धर्म है जो अल्लाह की तरफ़ से अंतिम रसूल और नबी, पैगंबर हजरत मोहम्मद साहब सल्ल. द्वारा इंसानों तक पहुंचाई गई अंतिम ईश्वरीय किताब (क़ुरआन) की शिक्षा पर स्थापित है। इस्लाम शब्द का अर्थ है – ‘अल्लाह को समर्पण’। इस प्रकार मुसलमान वह है, जिसने अपने आपको अल्लाह को समर्पित कर दिया, अर्थात इस्लाम धर्म के नियमों पर चलने लगा।

इस्लाम धर्म का आधारभूत सिद्धांत अल्लाह को सर्वशक्तिमान, एकमात्र ईश्वर और जगत का पालक तथा हज़रत मुहम्मद (सल्ल।) को उनका संदेशवाहक या पैगम्बर मानना है। यही बात उनके ‘कलमे’ में दोहराई जाती है – ला इलाहा इल्लल्लाह मुहम्मदुर्रसूलुल्लाह अर्थात ‘अल्लाह एक है, उसके अलावा कोई दूसरा (दूसरी सत्ता) नहीं और मुहम्मद उसके रसूल या पैगम्बर।’ कोई भी शुभ कार्य करने से पूर्व मुसलमान यह क़लमा पढ़ते हैं।

इस्लाम में अल्लाह को कुछ हद तक साकार माना गया है, जो इस दुनिया से काफ़ी दूर सातवें आसमान पर रहता है। वह अभाव (शून्य) में सिर्फ़ ‘कुन’ कहकर ही दुनिया रचता है। उसकी रचनाओं में आग से बने फ़रिश्ते और मिट्टी से बने मनुष्य सर्वश्रेष्ठ हैं। गुमराह फ़रिश्तों को ‘शैतान’ कहा जाता है। इस्लाम के अनुसार मनुष्य सिर्फ़ एक बार दुनिया में जन्म लेता है। मृत्यु के पश्चात पुनः वह ईश्वरीय निर्णय (क़यामत) के दिन जी उठता है और मनुष्य के रूप में किये गये अपने कर्मों के अनुसार ही ‘जन्नत’ (स्वर्ग) या ‘नरक’ पाता है।                                                 इस्लाम धर्म का उदय – Islam Dharm Story in Hindi

इस्लाम का उदय कब हुआ, इस पर अलग-अलग अवधारणाएं हैं। कुछ लोग इसे सातवीं सदी में आरम्भ हुआ मानते हैं तो कुछ मानते हैं कि यह आदिकाल से चल रहा है। एक पक्ष मानता है कि इस्लाम का उदय सातवीं सदी में अरब में हुआ। अंतिम नबी मुहम्मद साहब का जन्म 570 इस्वी में मक्का में हुआ। 613 इस्वी के आसपास उन्होंने लोगों को ज्ञान बांटना आरम्भ किया तो उनके बहुत से अनुयायी बनते चले गए। इसी को इस्लाम की शुरुआत कहा गया। दूसरे पक्ष के विचारक इसे सही नहीं मानते। वे इस्लाम के मूल ग्रंथ कुरआन के आधार पर इसकी शुरुआत देखते हैं। इनके अनुसार इस्लाम आदिकाल से अस्तित्व में है।

कुरआन में पहले इंसान ‘आदम’ का जिक्र है। ‘मुस्लिम’ शब्द का इस्तेमाल हज़रत इब्राहिम (अलैहि।) के लिए किया है, जो लगभग 4 हजार साल पहले एक महान पैगम्बर हुए। कहा जाता है कि हज़रत आदम (अलैहि।) से लेकर हज़रत मुहम्मद (सल्ल।) तक हजारों वर्षों में कई पैगम्बर हुए। इनमें से 26 के नाम कुरआन में हैं। इनके अनुसार, हज़रत मुहम्मद (सल्ल।) इस्लाम के प्रवर्तक(फाउंडर) नहीं थे, बल्कि आह्वाहक (ईश्वर का संदेश फैलाने वाले एक पैगम्बर) थे।

पैगंबर हजरत मोहम्मद साहब सल्ल.- Paigambar Muhammad Sahab

कुछ विद्वानों के मुताबिक पैगंबर हजरत मोहम्मद सल्ल. का जन्मदिन हिजरी रबीउल अव्वल महीने की 2 तारीख को मनाया जाता है। 570 ईसवी को शहर मक्का में पैगंबर साहब हजरत मुहम्मद सल्ल. का जन्म हुआ था। मक्का सऊदी अरब में स्थित है। हजरत मुहम्मद सल्ल. के जन्मदिन को ईद-ए-मिलाद-उन-नबी के नाम से मनाया जाता है।

आप सल्ल. के वालिद साहब (पिता) का नाम अब्दुल्ला बिन अब्दुल्ल मुतलिब था और वालिदा (माता) का नाम आमना था। सल्ल. के पिता का इंतकाल उनके जन्म के दो माह बाद ही हो गया था। ऐसे में उनका लालन-पालन उनके चाचा अबू तालिब ने किया। आपके चाचा अबू तालिब ने आपका खयाल उनकी जान से भी ज्यादा रखा।

25 वर्ष की आयु में आप सल्ल.  ख़दीजा नामक एक विधवा से विवाह किया। आप सल्ल.  के जन्म के समय अरबवासी अत्यन्त पिछडी, क़बीलाई और चरवाहों की ज़िन्दगी बिता रहे थे। अतः आप सल्ल. ने उन क़बीलों को संगठित करके एक स्वतंत्र राष्ट्र बनाने का प्रयास किया। 15 वर्ष तक व्यापार में लगे रहने के पश्चात आप सल्ल. कारोबार छोड़कर चिन्तन-मनन में लीन हो गये। मक्का के समीप हिरा की चोटी पर कई दिन तक चिन्तनशील रहने के उपरान्त उन्हें फरिश्तो के सरदार जिबरील का संदेश प्राप्त हुआ कि वे जाकर क़ुरान शरीफ़ के रूप में प्राप्त ईश्वरीय संदेश का प्रचार करें। तत्पश्चात उन्होंने इस्लाम धर्म का प्रचार शुरू किया।

उन्होंने मूर्ति पूजा का विरोध किया, जिससे मक्का का पुरोहित वर्ग भड़क उठा और अन्ततः आप सल्ल. ने 16 जुलाई 622 को मक्का छोड़कर वहाँ से 300 किलोमीटर उत्तर की ओर यसरिब (मदीना) की ओर कूच कर दिया। उनकी यह यात्रा इस्लाम में ‘हिजरत’ कहलाती है। इसी दिन से ‘हिजरी संवत’ का प्रारम्भ माना जाता है। कालान्तर में 630 ई. में अपने लगभग 10 हज़ार अनुयायियों के साथ हज़रत मुहम्मद (सल्ल।) ने मक्का पर चढ़ाई करके उसे जीत लिया और वहाँ इस्लाम को लोकप्रिय बनाया।

नबूवत मिलने के बाद आप सल्ल. ने लोगों को ईमान की दावत दी। मर्दों में सबसे पहले ईमान लाने वाले सहाबी हजरत अबूबक्र सिद्दीक रजि. रहे। बच्चों में हजरत अली रजि. सबसे पहले ईमान लाए और औरतों में हजरत खदीजा रजि. ईमान लाईं।

632 ईस्वीं, 28 सफर हिजरी सन 11 को 63 वर्ष की उम्र में हजरत मुहम्मद सल्ल. ने मदीना में दुनिया से पर्दा कर लिया। उनकी वफात के बाद तक लगभग पूरा अरब इस्लाम के सूत्र में बँध चुका था और आज पूरी दुनिया में  उनके बताए तरीके पर जिंदगी गुजारने वाले लोग हैं।

सच्चा मुसलमान – Muslims 

इस्लाम के मुताबिक कोई इन्सान तब तक सच्चा मुसलमान नहीं हो सकता जब तक कि वह पांच कर्मों को पूरा ना करे। इन पांचों में ये शामिल हैं- 1। वह इस बात को माने कि अल्लाह के अलावा कोई अन्य पूज्य नहीं है और मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम अल्लाह के संदेशवाहक हैं। 2। नमाज़ कायम करे। 3। अनिवार्य धर्म-दान (ज़कात) दे। 4। रमज़ान के महीने का रोज़ा रखे। 5। काबा का हज्ज करे, यदि वह वहां तक पहुंचने में समर्थ हो।

क़ुरान – Quran in Hindi

इस्लाम धर्म की पवित्र पुस्तक का नाम क़ुरान है जिसका हिन्दी में अर्थ ‘सस्वर पाठ’ है। क़ुरान हजरत मुहम्मद सल्ल. पर उतारी गई। अल्लाह ने फरिश्तों के सरदार जिब्राइल अलै. के मार्फत पवित्र संदेश (वही) सुनाया। उस संदेश को ही कुरआन में संग्रहित किया गया हैं। क़ुरान शरीफ़ 22 साल 5 माह और 14 दिन के अर्से में ज़रूरत के मुताबिक़ किस्तों में नाज़िल हुआ। क़ुरान शरीफ़ में 30 पारे, 114 सूरतें और 540 रुकूअ हैं। क़ुरान शरीफ़ की कुल आयत की तादाद 6666 (छः हज़ार छः सौ छियासठ) है।  कुरआन को नाजिल हुए लगभग 14 सौ साल हो गए लेकिन इस संदेश में जरा भी रद्दोबदल नहीं है।

मुसलमानों के लिये अल्लह् द्वारा रसूलों को प्रदान की गयी सभी धार्मिक पुस्तकें वैध हैं। मुसलमनों के अनुसार कुरान ईश्वर द्वारा मनुष्य को प्रदान की गयी अन्तिम धार्मिक पुस्तक है। कुरान में चार और पुस्तकों की चर्चा है:

  • सहूफ़ ए इब्राहीमी जो कि इब्राहीम को प्रदान की गयीं। यह अब लुप्त हो चुकी है।
  • तौरात (तोराह) जो कि मूसा को प्रदान की गयी।
  • ज़बूर जो कि दाउद को प्रदान की गयी।
  • इंजील (बाइबल) जो कि ईसा को प्रदान की गयी।

मुसलमान यह मानते हैं कि ईसाइयों और यहूदियों ने अपनी पुस्तकों के सन्दशों में बदलाव कर दिये हैं। वे इन चारों के अलावा अन्य धार्मिक पुसतकों का ईश्वरीय होने की सम्भावना से मना नहीं करते हैं।

नबी और रसूल – 

इस्लाम के अनुसार ईश्वर ने धरती पर मनुष्य के मार्गदर्शन के लिये समय समय पर किसी व्यक्ति को अपना दूत बनाया। यह दूत भी मनुष्य जाति में से होते थे और ईश्वर की ओर लोगों को बुलाते थे। ईश्वर इन दूतों से विभिन्न रूपों से समपर्क रखता था। इन को इस्लाम में नबी कहते हैं। जिन नबियों को ईश्वर ने स्वयं, शास्त्र या धर्म पुस्तकें प्रदान कीं उन्हें रसूल कहते हैं। हजरत मुहम्मद सल्ल. भी इसी कड़ी का भाग थे। उनको जो धार्मिक पुस्तक प्रदान की गयी उसका नाम कुरान है। कुरान में अल्लाह के 25 अन्य नबियों का वर्णन है। स्वयं कुरान के अनुसार ईश्वर ने इन नबियों के अलावा धरती पर और भी कई नबी भेजे हैं जिनका वर्णन कुरान में नहीं है। लगभग सन्सार मे 124000 नबी (दूत) वर्णन कुरान में है। सभी मुसलमान ईश्वर द्वारा भेजे गये सभी नबियों की वैधता स्वीकार करते हैं और मुसलमान, मुहम्मद को ईशवर का अन्तिम नबी मानते हैं।

सम्प्रदाय – Muslim Sects 

इस्लाम में दो मुख्य सम्प्रदाय – शिया और सुन्नी मिलते हैं। मुहम्मद साहब की पुत्री फ़ातिमा और दामाद अली के बेटों हसन और हुसैन को पैगम्बर का उत्तराधिकारी मानने वाले मुसलमान ‘शिया’ कहलाते हैं। दूसरी ओर सुन्नी सम्प्रदाय ऐसा मानने से इन्कार करता है। मिलने जुलने आने जाने में सलाम का रिवाज है। सलाम करने वाला “अस्स्लामु अलैक़मु” कहता है जिसका अर्थ है तुम पर ख़ुदा की तरफ़ से सलामती हो, इसका जवाब है। “व अलेकुम अस्सलाम” अर्थात तुम पर सलामती हो।

भारत में इस्लाम का प्रवेश – Islam in India

712 ई. में भारत में इस्लाम का प्रवेश हो चुका था। मुहम्मद-इब्न-क़ासिम के नेतृत्व में अरब के मुसलमानों ने सिंध पर हमला कर दिया और वहाँ के ब्राह्मण राजा दाहिर को हरा दिया। इस तरह भारत की भूमि पर पहली बार इस्लाम के पैर जम गये और बाद की शताब्दियों के हिन्दू राजा उसे फिर हटा नहीं सके।

         

Ram Mandir ram,

 

२२ जनवरी २०२४ को प्राणप्रतिष्ठा के समय श्री राम मंदिर
२२ जनवरी २०२४ को प्राणप्रतिष्ठा के समय श्री राम मंदिर
श्री राम जन्मभूमि तीर्थक्षेत्र

लार्सन एंड टूब्रो द्वारा निर्माण (सीबीआरआईराष्ट्रीय भूभौतिकीय अनुसंधान संस्थानऔर आईआईटी द्वारा सहायता प्राप्त)

निर्देशांक:निर्देशांक26°47′44″N 82°11′39″E / 26.7956°N 82.1943°E

   रामायण आदि कवि वाल्मीकि द्वारा लिखल्  संस्कृत कय एकठु अनुपम महाकाव्य होय। एहमा २४,००० श्लोक हैं। ई हिन्दू स्मृति कय उ अंग होय जवने कय माध्यम से रघुवंश कय राजा श्रीराम  कय गाथा कही गा है। एका आदिकाव्य भी कहि जात है। रामायण कय सात अध्याय हैं जवने कय काण्ड कय नाव से जाना जात हय।

रचनाकाल

कुछ भारतीय कहत हैं कि ई महाकाव्य ६०० ईपू से पहिलै लिखा गवा रहै। ईके पीछे युक्ति इ है कि महाभारत जो ईके पश्चात आवा बौद्ध धर्म के बारे में मौन है यद्यपि ईमा जैन, शैव, पाशुपत आदि अन्य परम्पराओं का वर्णन करा गवा है। इहै कारण रामायण गौतम बुद्ध के काल के पहिले का होएक चही। भाषा-शैली से भी इ पाणिनि कय समय से पहिले कय होएक चाही।

   अयोध्या जेका साकेत अउर रामनगरी भी कहा जात ह । भारत कय उत्तर प्रदेश राज्य मा स्थित एक ऐतिहासिक अउर धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण नगर अहै। इ पवित्र सरयू नदी के किनारे बसा अहै औ अयोध्या जिला का मुख्यालय अहै। इतिहास मा इ 'कोशल जनपद' भी कहा जात रहा. पौराणिक मान्यताओं के अनुसार अयोध्या मा सूर्यवंशी / रघुवंशी / आर्कवंशी राजाओं का राज हुआ करत रहा, जवने मा भगवान  राम अवतार लिए रहैं।

स्थापना अउर उत्पत्ति

मान्यता है कि इ नगर क मनु बसाए रहैं अउर इके 'अयोध्या' नाम दिहे रहैं जेकर अर्थ होत ह - अयोध्या अर्थात 'जेका जुद्ध क जरिये प्राप्त नाहीं कीन्ह जाइ सकत।' मशहूर चीनी यात्री ह्वेन त्सांग ७ वीं शताब्दी मा यहा आवा रहा। ओकरे अनुसार इहाँ २० बौद्ध मंदिर रहा अउर ३००० भिक्षु रहत रहेन । इ नगरी सत्तर पुरियन मँ स एक अहइ।

अयोध्या मथुरा माया काशी काञ्ची अवन्तिका ।
पुरी द्वारावती चैव सप्तैता मोक्षदायिका:॥
(अर्थ: अयोध्या, मथुराहरिद्वारकाशीकाञ्चीपुरमउज्जैन अउर द्वारिका - इ सात पुरिया नगर मोक्षदायी हैं ।)
अयोध्या

मुख्य आकर्षण

राम की पैड़ी का विहंगम दृष्य

मानव सभ्यता की पहलीन पुरी होने का पौराणिक गौरव अयोध्या को स्वाभाविक रूप से प्राप्त है। फिर भी रामजन्मभूमि, कनक भवन, हनुमानगढ़ी, राजद्वार मंदिर, दशरथमहल, लक्ष्मणकिला, कालेराम मंदिर, मणिपर्वत, श्रीराम की पैड़ी, नागेश्वरनाथ, क्षीरेश्वरनाथ श्री अनादी पंचमुखी महादेव मंदिर, गुप्तार घाट सहित अनेक मंदिर इहाँ प्रमुख दर्शनीय स्थल ह । बिड़ला मंदिर, श्रीमणिरामदास जी का छावनी, श्रीरामवल्लभाकुंज, श्रीलक्ष्मणकिला, श्रीसियारामकिला, उदासीन आश्रम रनोपाली अउर हनुमान बाग जइसन कई आश्रम आगंतुकन का केन्द्र ह ।

मुख्य पर्व

अयोध्या यूँ तो सदैव किसी न किसी आयोजन में व्यस्त रहती है परन्तु यहाँ कुछ विशेष अवसर हैं जो अत्यन्त हर्षोल्लास के साथ मनाये जाते हैं। श्रीरामनवमी श्रीजानकीनवमी , गुरुपूर्णिमा , सावन झूला , कार्तिक परिक्रमा , श्रीरामविवाहोत्सव आदि उत्सव यहाँ प्रमुखता से मनाये जाते हैं।  

राम मंदिर एक महत्वपूर्ण हिन्दू मंदिर है जवन वर्तमान मा भारत कय उत्तर प्रदेश कय अयोध्या मा निर्माणाधीन है। जनवरी २०२४ मा एकर गर्भगृह अउर प्रथम तल बनके तैयार है अउर २२ जनवरी २०२४ मा इमे श्रीराम के बाल रूप में विग्रह का प्राणप्रतिष्ठा की गई। श्री राम एक हिन्दू देवता है जेके भगवान् विष्णु का अवतार माना जात है। प्राचीन भारतीय महाकाव्य, रामायण के अनुसार, राम का जन्म अयोध्या मा भईल रहे।

१६ वीं शताब्दी मा, बाबर पूरे उत्तर भारत मा मंदिरों पर आक्रमण की अपनी श्रृंखला मा मंदिर पर हमला कैके नष्ट कइ दिहिस। बाद मा, मुगलो ने एक मस्जिद, बाबरी मस्जिद का निर्माण कईले, जेके राम का जन्मभूमि, राम जन्मभूमिका स्थान माना जात है। मस्जिद का सबसे पहिला रिकॉर्ड १७६७ मा मिलेला, जवन जेसुइट मिशनरी जोसेफ टिफेंथेलर द्वारा लिखित लैटिन पुस्तक डिस्क्रिप्टियो इंडिया मा मिलेला। उनके हिसाब से, मस्जिद का निर्माण रामकोट मंदिर, जवन अयोध्या में राम का किला माना जात है, अउर बेदी, जहाँ राम का जन्मस्थान है, का ध्वस्त कइके करल गईल रहे।

 राम,(रामचन्द्र), प्राचीन भारत म अवतरित, भगवान रहेन। हिन्दू धर्म में, राम, विष्णु कै १० अवतारन में से सातवा अहेंन। इनकै जनम अयोध्या नरेश दशरथ अउर महारानी कौशल्या के हिंया भवा रहान। राम भगवान क्य जीवनकाल अउर पराक्रम पे महर्षि वाल्मीकि रामायण लिखेन अउर गोस्वामी तुलसीदास भक्ति काव्य श्री रामचरितमानस कै रचना केहेन। हिन्दू धरम में भगवान् श्री रामचंद्र जी के बहुतै महत्व अहै। इनका मर्यादा पुरषोत्तम कहा जाथे। भगवान विष्णु क्य एक अवतार रहेन।

फोटू

श्रीरामजन्मभूमि

शहर के पश्चिमी हिस्से में स्थित रामकोट में स्थित अयोध्या का सर्वप्रमुख स्थान श्रीरामजन्मभूमि है। श्रीराम-लक्ष्मण-भरत और शत्रुघ्न चारों भाइयों के बालरूप के दर्शन यहाँ होते हैं। यहां भारत और विदेश से आने वाले श्रद्धालुओं का साल भर आना जाना लगा रहता है। मार्च-अप्रैल में मनाया जाने वाला रामनवमी पर्व यहां बड़े जोश और धूमधाम से मनाया जाता है।

कनक भवन

हनुमान गढ़ी के पास स्थित कनक भवन अयोध्या का एक महत्वपूर्ण मंदिर है. इ मंदिर सीता अउर राम क सोना क मुकुट पहिरे मूर्तियन बरे प्रसिद्ध अहइ। एही कारन कई बार इ मंदिर कय सोना कय घर भी कहा जात है। इ मंदिर १८९१ मा रानी टीकमगढ़ द्वारा बनवावा गवा रहा। इ मंदिर का श्री विग्रह (श्री सीताराम जी) भारत का सबसे सुंदर स्वरूप कहा जा सकता है। इहाँ नित्य दर्शन के अलावा सब समैया-उत्सव भव्यता से मनावल जात हैं.

हनुमान गढ़ी

नगर के केन्द्र मा स्थित इ मंदिर कय ७६ कदम की चाल से पहुँचा जाय सकत है। अयोध्या क भगवान राम क नगरी कहा जात अहै। मान्यता है कि हनुमान जी इहाँ हमेशा रहत रहेलन। एही से अयोध्या आकर भगवान राम के दर्शन से पहिले भक्त हनुमान जी के दर्शन करत हैं। इहाँ कय सबसे प्रमुख हनुमान मंदिर "हनुमानगढ़ी" के नाम से प्रसिद्ध अहै । [] इ मंदिर राजद्वार के सामने ऊँच चट्टान पर स्थित अहै । कहा जात ह कि हनुमान जी इहाँ एक गुफा मा रहत रहे अउर रामजन्मभूमि अउर रामकोट की रक्षा करत रहे। इ उहइ ठउर रहा जहाँ हनुमान जी निवास करत रहेन।

भगवान श्रीराम हनुमान जी का इ अधिकार दिहे रहेन कि जउन भी भक्त मोरे दर्शन खातिर अयोध्या आवत ह, उ पहिले तोरे दर्शन पूजन करे। इहां आज भी छोट दीपावली के दिन आधी रात मा संकटमोचन का जन्म दिवस मनावा जात है। पवित्र नगरी अयोध्या मा सरयू नदी मा पाप धोवे से पहिले लोगन का भगवान हनुमान से आज्ञा लेवे के चाही। इ मंदिर अयोध्या मा एक पहाड पर स्थित है, मंदिर तक पहुचने के लिए लगभग ७६ सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं। एकरे बाद पवनपुत्र हनुमान की ६ इंच की प्रतिमा का दर्शन होत है, जवन हमेशा फूल-माला से सुशोभित रहत है। मुख्य मंदिर मा बाल हनुमान के साथ अंजनी माता की प्रतिमा है। श्रद्धालुअन का मानना है कि ई मंदिर में आवे से उनकर सब मनोकामना पूर्ण होई जात है। मंदिर परिसर मा मां अंजनी और बाल हनुमान की मूर्ति है जेहमा हनुमान जी, अपनी मां अंजनी की गोद मा बालक के रूप मा विराजमान हैं।

इ मंदिर कय निर्माण के पीछे एक कथा प्रचलित अहै । सुल्तान मंसूर अली अवध का नवाब रहा. एक दाई क बात अहइ कि एक ठु गरीब विधवा स ओकर महतारी कहेस, "जब ताईं मइँ हुवाँ जाउँ, कृपा कइके मोका जाइ देइँ अउ मइँ हुआँ स चला जाउँ। प्राण बचै क आसार नाहीं रहे, रात क कालीमा गहराये के साथ ही ओकर नाड़ी उखड़ने लगी तो सुल्तान थके हारके संकटमोचक हनुमान जी के चरणों मा माथा रखि दिहस। हनुमान आपन आराध्य भगवान श्रीराम का ध्यान कइलन अउर सुल्तान के बेटा के धड़कन फेर से शुरू हो गइल. जब आपन इकलौता बेटा के जान बचाई गई तब अवध का नवाब मंसूर अली बजरंगबली के चरणों मा माथा टेक देले । जेकरे बाद नवाब न केवल हनुमान गढ़ी मंदिर का जीर्णोद्धार कराया बल्कि ताम्रपत्र पर लिखके इ घोषणा कीन कि कभी भी इ मंदिर पर कउनो राजा या शासक का कोई अधिकार नाहीं रही अउर न ही इ मंदिर के चढ़ावा से कोई कर वसूलल जाई । उ ५२ बीघा जमीन हनुमान गढ़ी अउर इमली वन खातिर उपलब्ध कराई।

इ हनुमान मंदिर के निर्माण का कोई स्पष्ट प्रमाण त नाही मिल रहा है, लेकिन कहत है कि अयोध्या न जाने केतना बार बसि अउर उजड़ी, लेकिन फिर भी एक जगह जवन हमेशा अपने मूल रूप में रहा उ हनुमान टीला है, जवन आज हनुमान गढ़ी के नाम से प्रसिद्ध है. लंका से विजय का प्रतीक रूप से लावल गईल निशान भी एही मंदिर में रखल गईल जवन आज भी खास अवसर पर बाहर निकालल जाला अउर जगह जगह पर इनकर पूजा - अर्चना कईल जाला। मंदिर मा विराजमान हनुमान जी का वर्तमान अयोध्या का राजा माना जात है। कहत हवें कि हनुमान जी इहाँ एक गुफा मा रहत रहे अउर रामजन्मभूमि अउर रामकोट की रक्षा करत रहे। श्रद्धालुअन का मानना है कि ई मंदिर में आवे से उनकर सब मनोकामना पूर्ण होई जात है।

आवागमन

रेल मार्ग

अयोध्या, लखनऊ पंडित दीनदयाल रेलवे प्रखंड का एक स्टेशन अहै। लखनऊ से बनारस रूट पर फैजाबाद से आगे अयोध्या जंक्शन है। अयोध्या का एशिया का सर्वश्रेष्ठ रेलवे स्टेशन के रूप मा विकसित करे का काम तेजी से चल रहा है। उत्तर प्रदेश अउर देश कय लगभग तमाम शहर से इहाँ पहुँचा जाय सकत है। इहँवा से बस्ती, गोंडा, बनारसगोरखपुर, लखनऊ, प्रयागराज, के साथ भोपालमुम्बईअमृतसर, जम्बू, बिलासपुर, पटना, देहरादूनसूरतकोलकातादिल्लीरामेश्वरम खातिर भी सीधा रेलगाड़ी है

सड़क मार्ग

उत्तर प्रदेश सड़क परिवहन निगम की बसें लगभग सभी प्रमुख शहरो से अयोध्या खातिर चलती हैं। अयोध्या राष्ट्रीय राजमार्ग २७ (भारत) अउर राष्ट्रीय राजमार्ग ३३० (भारत) अउर राज्य राजमार्ग से जुड़ा अहै।

श्री मद् भगवद गीता -अध्याय-1, कुरुछेत्र के युध स्थल मे सेन्य निरीकछ्ण

 धर्म छेत्रे कुरुछेत्रे  सम्वेता युयुत्सव: ।

मामका: पाण्डवाच्श्रेव किम्कुर्वत संज्ज्य ॥१॥


धुतराश्ट ने कहा - हे संजय । धर्म भुमी कुरुछेत्र मे युध कि इच्छा से एक्त्र हुए मेरे तथा पंढु के पुत्रो ने क्या किया ?

तात्पर्य-  भगवद गीता एक बहुपठित आस्तिक विज्ञान हैं जो गीता महाकाव्य मे सार रुप मे दिया हुआ हैं इसमे बताया गया हैं कि अपनी सवार्थ प्रेरित के बिना श्री कृष्ण कि भगती कि सहायता से इसे समझने का यतन करे। यदि किसि को भगवद गीता को समझने का सोभाग्य प्राप्त होता हैं तो यह समस्त वेदिक ग्यान ओर संसार के समस्त शास्त्रो के अधयन को पिछे छोड. देता हैं 

माना जाता हैं कि इस दर्शन कि प्रस्तुति कूरूछेत्र के युध्दस्थल मे हुई जो वेदिक युग से पवित्र तिर्थ स्थल रहा हैं।  

संजय श्री व्यास जी का शिस्य था अत: उन कि क्रिपा से संजय ध्रुत राष्ट के पास बेठे -बेठे  युद्ग स्थल का दर्शन कर सक्ता था इसलिए  ध्रुत राष्ट  ने उस्से  युध स्थल के विष्य मे पुछा।

इस युद्ग मे धर्म के पिता श्रीकूष्ण उप्सिथित थे जिस्से  धर्म कि विजय होना इस युध मे  यही सर्थक करता हैं ।


संजय उवाच

दुष्ता तु पाण्ड्वानीक्म व्यूढ्म दुर्योयोधनस्त्दा ।

आचार्यमुपसडु राजा वचनम्ब्रवित ॥२॥


संजय ने कहा - हे राजन ! पांडु पुत्रो द्वारा सेना की व्युह रचना देख्कर राजा दुरयोधन अपने गुरु के पास गया ओर उसने ये सबद कहे ।

तात्पर्य- संजय ने राजा को प्रोत्साहित करते हुए कहा कि हे राजा पाडवो कि व्युह रचना देख कर राजा दुर्योधन को अपने सेना पती के पास जाना पडा. जिस्से यह दिखाई देता हैं कि दुर्योधन का कुट्नितिक व्यव्हार  उसके भय को नही छिपा पाया ।